गणेश चतुर्थी हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है यह त्यौहार भारत के कई राज्यों में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है किंतु महाराष्ट्र में इसकी अधिक मान्यता है महाराष्ट्र में यह पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।
Date | तारीख | 07 सितम्बर, 2024 |
---|---|
Day | दिन | Saturday | शनिवार |
गणेश चतुर्थी का मध्याह्न मुहूर्त शुभ मुहूर्त | सुबह 11.03 से दोपहर 1:33 बजे तक |
पौराणिक परंपराओं के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन ही गणेश जी का जन्म हुआ था इसलिए भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को प्रतिवर्ष यह गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जाता है महाराष्ट्र में बड़े ही धूमधाम से और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और यह त्यौहार सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में मनाया जाता है इसके अलावा इस पर्व की हर तरफ मान्यता होती है इस पर्व को मनाने की एक वजह यह भी है कि इसी दिन गणेश जी ने महाभारत का लेखन कार्य शुरू किया था।
महर्षि वेदव्यास ने गणेश जी से महाभारत की रचना के लिए गणेश जी का आवाहन किया था ऐसा माना जाता है कि चतुर्थी के दिन ही वेदव्यास जी ने मंत्र श्लोक बोलना आरंभ किया था जब गणेश जी महाभारत का लेखन कार्य शुरू करने जा रहे थे तो गणेश जी ने कहा था कि वह जब लिखना प्रारंभ करेंगे तो कलम नहीं रुकेंगे यदि एक बार कलम रुक गई तो वह अपना लेखन कार्य वही रोक देंगे.किंतु वेदव्यास विद्वान थे उन्होंने गणेश जी से कहा कि भगवान आप विद्वानों में महान हैं सबसे आगे हैं और मैं साधारण ऋषि यदि श्लोक बोलते समय कोई गलती हो जाए तो आप उसे ठीक करते हुए उसे लिपिबद्ध करते जाएं इस तरह महाभारत का लेखन कार्य शुरू हुआ और लगातार 10 दिन तक चला अनंत चतुर्दशी के दिन जब महाभारत का लेखन कार्य पूर्ण हुआ तो गणेश जी का शरीर अकड़ चुका था और लगातार 10 दिनों तक एक ही जगह पर बैठे रहने के कारण उनके शरीर पर धूल मिट्टी जमा हो गई थी तब गणेश जी ने सरस्वती नदी में स्नान करके अपना शरीर साफ किया इसलिए इसी मान्यता के चलते गणेश जी की स्थापना 10 दिन तक की जाती है और 11 दिन गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है और इसी मान्यता के चलते हम चढ़े चतुर्थी मनाते हैं
गणेश चतुर्थी की शुरुआत सबसे पहले महाराष्ट्र से हुई गणेश चतुर्थी के दिन से इसका आरंभ होता है और इसको शुरू करने के पीछे का कारण यह भी है कि ऐसा माना जाता है कि गणेश जी उत्सव की शुरुआत 1992 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में की थी उस वक्त देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी ऐसे में गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव के नाम पर लोगों में एकता भक्ति की भावना जागृत करने के लिए गणेश जी का उत्सव मनाया तभी से गणेश चतुर्थी की शुरुआत मानी जाती है
पौराणिक कथा के अनुसार जिस दिन में गणेश जी का जन्म हुआ था उस दिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी थी इसीलिए उस दिन को गणेश चतुर्थी नाम दिया गया है इसीलिए इसी दिन गणेश चतुर्थी मनाई जाती है और उनकी पूजन से घर में सुख शांति आती है गणेश पुराण के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का उनका जन्म हुआ था इसका एक आध्यात्मिक महत्व यह है कि भगवान गणेश जी विघ्न को हरने वाले हैं और भक्तों का मंगल करने वाले हैं इसीलिए उनकी पूजा आराधना से हमें संपूर्ण फल की प्राप्ति होती है
पुराणों के अनुसार गणेश चतुर्थी का एक ही मतलब होता है भगवान गणेश की आराधना देवों के देव महादेव के पुत्र गणेश जी की पूजा सबसे पहले की जाती है इसीलिए गणेश जी को सबसे पहले माना गया है और गणेश चतुर्थी के दिन इनकी पूजा अर्चना करके हमें सुख समृद्धि प्राप्त होती है इनकी पूजा आराधना करना है इस पर्व का खास मतलब होता है इसीलिए इस पर्व का खास मतलब विघ्नहर्ता को खुश करना उनकी कृपा पाना होता है जो हम इस दिन को बनाकर करते हैं
चंद्रमा पर आधारित हिंदू पंचांग में हर माह में दो चतुर्थी होती हैं एक शुक्ल पक्ष में दूसरी कृष्ण पक्ष में धर्म ग्रंथों के अनुसार अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं और पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं हिंदू ग्रंथों के अनुसार यह दोनों चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित है जो लोग भगवान गणेश को अपना इष्टदेव मानते हैं वह इस दिन विधि विधान से व्रत रखकर उनकी उपासना करते है
मान्यताओं के अनुसार श्रद्धालु इन दोनों व्रत को रात में चंद्रमा के उदय होने के बाद इसे दूध और जल से अर्घ्य देकर फूल फल और पूजा मिष्ठान अर्पण करके ही अपना व्रत खोलते हैं इस प्रकार विनायक चतुर्थी और संकष्टि चतुर्थी का व्रत तो हर महीने में होता है किंतु गणेश चतुर्थी केवल भादो के महीने में चतुर्थी तिथि को ही होता है
गणेश जी की स्थापना करने के कुछ नियम होते हैं दोस्तों कहते हैं हम किसी भी पूजा या किसी भी भगवान की स्थापना करते हैं तो उससे पूर्व हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब हम व्रत या किसी भगवान की स्थापना कर रहे हैं तो वह पूरे विधि विधान से होनी चाहिए इसी तरह जब हम विघ्नहर्ता गणेश जी की स्थापना करते हैं तो हमें कुछ नियमों का पालन करना चाहिए
प्रथम पूज्य श्री गणेश जी को विशेष रूप से दूर्वा अर्पित की जाती है दुर्वा एक प्रकार की घास है और यह घास गजानन को अति प्रिय है दुर्बा चढ़ाने से गजानन की कृपा प्राप्त होती है और घर में रिद्धि-सिद्धि का वास होता है किंतु बहुत से लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होती कि आखिर गणेश जी पर दुर्गा क्यों चढ़ाते हैं यह एक प्राचीन परंपरा है और इस के बारे में प्रचलित कथा भी है प्राचीन काल में अन्ना सुर नाम का एक दैत्य रहता था इस दैत्य के आतंक से स्वर्ग और धरती पर त्राहि त्राहि मची हुई थी अन्नासुर ऋषि मुनि और आम लोगों को जिंदा निकल जाता था
दैत्य से त्रस्त होकर देवराज इंद्र सहित सभी देवी देवता और ऋषि मुनि महादेव से प्रार्थना करने पहुंचे सभी ने शिवजी से प्रार्थना की कि वह अन्ना सुर के आतंक से मुक्ति दिलाए और उसका नाश करें तब शिवजी ने सभी देवी देवताओं व ऋषि-मुनियों की प्रार्थना सुनकर शिवजी ने कहा कि अन्नासर का अंत केवल गणेश ही कर सकते हैं वह बोले के अन्नासर का अंत करने के लिए उसे निकलना पड़ेगा और इस कार्य को गणेश जी ही कर सकते हैं. और गणेश जी का पेट काफी बड़ा है और वह अन्नासर को आसानी से निकल सकते हैं यह सुनकर सभी देवी देवता गण भगवान गणेश के पास पहुंचे और उनकी स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया तब गणेश जी अन्नासुर को समाप्त करने को तैयार हुए इसके बाद गणेश जी और अन्नासुर के बीच घमासान युद्ध हुआ अंत में गणेश जी ने अन्नासुर को निगल लिया .इस प्रकार अन्नासुर के आतंक का अंत हुआ/ जब अन्नासुर को गणेश जी ने निकला तो उनके पेट में बहुत जलन हुई /कई प्रकार के उपाय करने के बाद भी उनकी जलन शांत नहीं हुई तब कश्यप ऋषि मुनि ने दुर्बा की 21 गांठ बनाकर श्री गणेश जी को खाने को दी दुर्वा खाते ही उनके पेट की जलन शांत हुई तभी से गणेश जी पर दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित है चतुर्थी तिथि को गणेश जी घर घर पधारते हैं इस दिन गणेश जी की स्थापना की जाती है विघ्नहर्ता गणेश जी बुराइयों और बाधाओं का विनाश करने वाले हैं जो मनुष्य इस व्रत को करता है उसके जीवन में जो भी कष्ट जो भी परेशानी होती है भगवान श्री गणेश सब को दूर कर देते हैं और जो भी मनोकामना भक्तों के मन में होती है उसको विघ्नहर्ता दूर कर देते हैं
देवों के देव भगवान गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाए जाने वाले गणेश चतुर्थी और लोग काफी धूमधाम से और हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं और महाराष्ट्र में तो इसे मनाने का अत्यधिक महत्व है किंतु जब हम गणेश जी की पूजा 10 दिन तक करते हैं तो इसके बाद विसर्जन क्यों करते हैं इसके बारे में आज हम संपूर्ण जानकारी देंगे पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि वेदव्यास जी ने गणेश जी को महाभारत के लेखन कार्य के लिए आमंत्रित किया था तब गणेश जी ने पूरे 10 दिनों तक महाभारत का लेखन कार्य किया और 10 दिनों तक लगातार एक ही जगह बैठे रहने के कारण उनका शरीर अकड़ गया और पूरे शरीर पर धूल मिट्टी जमा हो गई तब गणेश जी के शरीर का तापमान भी बढ़ गया तब महा ऋषि ने उनको एक सरोवर में डुबकी लगाकर स्नान कराया तब उनके शरीर का तापमान सामान्य हो पाया इसी कारण इस प्रथा को हम विसर्जन के रूप में मनाते हैं
पौराणिक कथा के अनुसार धन के देवता कुबेर को अपने धन पर अभिमान हो जाता है वह सोचते हैं कि मैं इस दुनिया में मैं सबसे अधिक धनवान हूं तो क्यों ना मैं सभी देवताओं को एक-एक करके भोजन पर आमंत्रित करूं और सभी को अपने धन वैभव का प्रदर्शन करके दिखलाऊंगा ऐसा सोचकर कुबेर सर्वप्रथम भोलेनाथ के पास गए और बोले हैं भोलेनाथ में सभी देवताओं को भोजन पर आमंत्रित करना चाहता हूं और मैं चाहता हूं कि आप सबसे पहले मेरे महल में आकर भोजन ग्रहण करें/ तब भोलेनाथ कुबेर की मनसा समझ गए और बोले मुझे क्षमा कीजिए कुबेर महाराज मैं आपका यह आमंत्रण स्वीकार नहीं कर सकता किंतु मैं अपने स्थान पर अपने पुत्र गणेश को आपके साथ भेज देता हूं तब कुबेर कहते हैं कि ठीक है प्रभु गणेश जी को भोजन के लिए भेज दीजिए उसके बाद गणेश जी को अपने साथ लेकर अपने महल में आ जाते हैं और गणेश जी को अपना धन ऐश्वर्य दिखाने लगते हैं और कहते हैं आइए गणेश जी महाराज आज मैं आपको सोने की थाली में भोजन कराऊंगा जब गणेश जी भोजन करना आरंभ करते हैं
तो धीरे-धीरे कुबेर जी का सारा भोजन समाप्त होने लगता है और गणेश जी कहते हैं और लाओ पूरी कुबेर महाराज और लाओ खीर ऐसा करते-करते गणेश जी कुबेर जी का सारा भोजन समाप्त कर देते हैं अंत में गणेश जी कुबेर जी से कहते हैं क्या हुआ महाराज भोजन और मंगाओ तब कुबेर जी समझ जाते हैं और गणेश जी से कहते हैं भोजन कहां से मंगाऊ गणेश जी भोजन तो सब समाप्त हो चुका है तो गणेश जी कहते हैं तुम्हारे घर में जो भी हो फल फ्रूट सब्जी आदि वह सभी मंगा दीजिए ऐसा सुनकर कुबेर जी महाराज ने घर में जो भी था सब मंगा दिया धीरे-धीरे वह भी समाप्त होने लगा तब कुबेर जी समझ जाते हैं कि गणेश जी उनका गुरुर चूर करने आए हैं तब कुबेर जी गणेश जी के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि प्रभु मैं समझ गया कि आपकी भूख क्यों शांत नहीं हो रही है मुझे क्षमा करें मैं अब कभी अभिमान नहीं करूंगा कृपया करके मुझे क्षमा कीजिए ऐसा सुनकर गणेश जी उनको क्षमा कर देते हैं और वापस कैलाश पर्वत के लिए निकल पड़ते हैं
किंतु ज्यादा भोजन करने के कारण छोटा सा मूशक उनका वजन नहीं झेल पाया और संतुलन बिगड़ जाता है और भगवान गणेश जी जमीन पर गिर जाते हैं तभी उनके सारे कपड़े गंदे हो जाते हैं तभी अचानक गणेश जी को किसी के हंसने की आवाज सुनाई देती है वे इधर उधर देखते हैं किंतु उन्हें कोई दिखाई नहीं देता अचानक उनकी निगाह आसमान की तरफ चंद्रमा पर पड़ती है जो बड़ी जोर जोर से हंस रहे होते हैं यह सब देखकर गणेश जी को क्रोध आ जाता है और वह चंद्रमा को श्राप देते हैं कि तुम्हें अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड है ना चंद्रदेव तो मैं तुम्हें श्राप देता हूं आज से तुम्हारी चमक कम हो जाएगी तब चंद्रमा को अपनी भूल का एहसास होता है और वह गणेश जी से क्षमा मांगते हैं और वह कहते हैं मुझसे भूल हो गई मुझे क्षमा कीजिए गणेश जी महाराज कृपया करके अपना श्राप वापस ले लीजिए कुबेर जी के बार-बार आग्रह करने पर गणेश जी का गुस्सा शांत हुआ तो गणेश जी कहते हैं कि दिया गया श्राप पूर्ण रूप से वापस तो नहीं हो पाएगा किंतु चंद्रदेव केवल 1 दिन ही आप पर श्राप का पूर्ण असर होगा तब से अमावस्या के दिन चंद्रमा दिखाई नहीं देगा साथ ही गणेश जी ने उन्हें यह वरदान दीया कि मेरी हर चतुर्थी पर मेरे साथ आपकी भी पूजा होगी आपको अर्घ्य देने पर ही व्रत पूर्ण होगा किंतु मेरा अपमान करने के कारण आज के दिन आपको देखने वाला कलंक का भागी बनेगा तभी से गणेश चतुर्थी वाले दिन चंद्रमा को देखने से दोष लगता है
आप गणेश जी की स्थापना अपने घर में कर रहे हैं तो सबसे पहले जिस जगह पर आप उनको विराजमान करते हैं उसी स्थान को स्वच्छ कर लें उसके बाद उस जगह एक चौकि या रंगोली बनाएं उसके ऊपर एक चौकी रखें तत्पश्चात चौकि पर गंगाजल डालें और उसको शुद्ध करें उसके बाद उस चौकी पर एक लाल कपड़ा बिछाए उसके बाद चौकी पर गणेश जी को स्थापित करें गणेश जी को जनेऊ पहनाए उसके बाद उनका श्रंगार करें उनको वस्त्र धारण कराएं उसके बाद उनकी पूजा की थाली तैयार करें
पूजा की थाली में हम गणेश जी की पूजा की सारी सामग्री रखेंगे सबसे पहले रोली सिंदूर अष्टगंध चंदन अक्षत इत्र पान के पत्ते पांच सुपारी पांच खड़ी हल्दी पांच प्रकार के फल पंचामृत फूल पीतांबर नैवेद्य या मोदक नारियल एक तावे का लोटा जल से भरा हुआ एक दीपक धूप दुर्वा घास सनीपद इस प्रकार सभी सामग्री से भगवान की पूजा की थाली तैयार करें
सबसे पहले हम गणेश जी को रोली और चंदन का तिलक लगाएंगे उसके बाद उनको पुष्प अर्पण करेंगे और गणेश जी की स्थापना अगर आप घर में कर रहे हैं तो कलश स्थापना अवश्य करें इसके बाद दीपक जलाएंगे धूप जलाएंगे तत्पश्चात जल अर्पित करेंगे फल अर्पित करेंगे फिर अक्षत चढ़ाएंगे और ध्यान रखें जब आप गणेश जी की पूजा कर रहे हो तो मंत्रों का जाप अवश्य करें उसके बाद हम उनको पीतांबर अर्पित करेंगे मोदक या जो भी आपने भोग के लिए बनाया हो वह रखें उसके बाद नारियल चढ़ाएं और सबसे जरूरी दुर्वा चढ़ाएं उसके बाद भगवान श्री का आवाहन करें और गणेश जी से हाथ जोड़कर क्षमा याचना करें.
हे ईश्वर गणेश जी यदि आप की पूजा अर्चना में कोई कमी या गलती हो गई हो तो हमें क्षमा करें और हमारी पूजा स्वीकार करके इस स्थान पर विराजमान हो ऐसा कहते हुए क्षमा मांग लें और उनको विराजमान करें उसके बाद आरती करके पूजा संपन्न करें और सब में प्रसाद वितरित करें
भारतीय पौराणिक धर्म के अनुसार, गणेश जी की शुभ मूर्ति गजेंद्र मोक्षन के बाद, गणपति बप्पा की पूजा के लिए विशेष रूप से स्वीकार्य होती है। यह मूर्ति विभिन्न रूपों में आती है और इनका अपना अलग महत्व होता है।
श्री सिद्धि विनायक : यह मूर्ति श्री गणेश की सार्थकता और सिद्धियों की प्रतिष्ठा को दर्शाती है। इस मूर्ति को घर में रखने से सुख और समृद्धि मिलती है।
बाल गणपति : बच्चों को आशीर्वाद देने वाले गणेश जी के इस रूप को पूजन का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
हरिद्रा गणपति : यह मूर्ति सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिए पूजी जाती है, और विवाह से संबंधित समस्याओं का समाधान करने में मदद करती है।
धन्यलक्ष्मी गणपति : यह मूर्ति वित्तीय समृद्धि के लिए पूजी जाती है, और व्यापार में लाभ के लिए इसका विशेष महत्व होता है।
उच्चिष्ट गणपति : यह मूर्ति श्री गणेश की श्रेष्ठता और सम्प्रेषण शक्ति का प्रतीक होता है, और शिक्षा के क्षेत्र में उनकी कृपा को प्राप्त करने के लिए पूजा जाता है।
गणेश जी का मुख पूजा स्थल में पूर्व दिशा में होना चाहिए। यह हिन्दू धर्म में माना जाता है कि गणपति बप्पा का मुख पूर्व की ओर होने पर उनकी कृपा और आशीर्वाद सभी के ऊपर बनी रहती है मुख पूर्व की ओर होने से आपके जीवन में समृद्धि, सुख, और समानता आती है यह एक प्राचीन परंपरागत विचारधारा है।
भगवान गणेश पहले पूजनीय देव हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश चतुर्थी की रात्रि में चंद्र देव का दर्शन नहीं करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा के दर्शन से झूठा कलंक या आक्षेप लग सकता है। गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा की दृष्टि से बचना शुभ होता है।
गणेश पूजा में कलश को पूजा स्थल के पश्चिमी दिशा में रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। कलश को पूजा स्थल के उत्तरी दिशा में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि हिन्दू धर्म में उत्तरी दिशा को ईश्वरीय दिशा माना जाता है और उसे कलश स्थान के रूप में रखना अनुचित समझा जाता है पूजा स्थल पर कलश को पश्चिमी दिशा में स्थापित करने से गणपति बप्पा के आशीर्वाद का अधिक सम्मान होता है और पूजा का आयोजन समृद्धि, शांति, और सुख के साथ होता है। इससे पूजा स्थल में शुभता और प्राकृतिक ऊर्जा का आभास होता है और वहां की आत्मा को प्राणी संजीवनी ऊर्जा मिलती है।